इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक्स को फटकार, कहा- भारतीय कानून से बच नहीं सकते सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म

लखनऊ
 इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (ट्विटर) के सहयोग न करने के रवैये पर नाराजगी जताई है। हाईकोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि बहुराष्ट्रीय डिजिटल मंच भारतीय कानून और जांच एजेंसियों के प्रति जवाबदेही से बच नहीं सकते। स्पष्ट किया कि भारतीय कानून का दायरा इतना व्यापक है कि वह किसी भी उल्लंघन तक पहुंच सकता है और दोषियों को न्याय के कटघरे में ला सकता है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अजय भनोट एवं न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने साइबर अपराध के एक मामले में सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया मंच X के अधिकारियों का पुलिस जांच में सहयोग न करना किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया मंच भारतीय कानूनों और कानून के तहत कार्य कर रही जांच एजेंसियों के प्रति जवाबदेही से मुक्त नहीं हैं। भारतीय कानून के हाथ इतने लंबे हैं कि वे किसी भी उल्लंघन तक पहुंच सकते हैं और इतने मजबूत हैं कि दोषियों को न्याय के कठघरे तक ला सकें। मामले में जांच अधिकारी ने कोर्ट में दाखिल हलफनामे में बताया कि एक्स ने उस खाते का यूआरएल पहचान विवरण और आईपी पता उपलब्ध नहीं कराया, जिससे याची मिथिलेश कुमार के अश्लील वीडियो और तस्वीरें साझा की गई थीं।

ये भी पढ़ें :  डॉ. कुसमरिया ने मध्यप्रदेश पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग के अध्यक्ष पद का किया कार्यभार ग्रहण

जांच अधिकारी ने कहा कि इस असहयोग के कारण वह मामले में आगे बढ़ने में असमर्थ हैं और जांच पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि पहली नजर में यह हलफनामा पुलिस व्यवस्था की विफलता स्वीकार करने जैसा प्रतीत होता है। एक ओर एक्स के जिम्मेदार अधिकारियों ने जांच में बाधा उत्पन्न की, वहीं दूसरी ओर पुलिस ने भी अपने वैधानिक दायित्वों का निर्वहन नहीं किया। याची मिथिलेश कुमार ने याचिका दाखिल कर गाजियाबाद पुलिस आयुक्त को निर्देश देने की मांग की कि उनकी एफआईआर की निष्पक्ष, प्रभावी और शीघ्र जांच पूरी कराई जाए।

ये भी पढ़ें :  दिवंगत स्टीव जॉब्स की पत्नी लॉरेन पॉवेल महाकुंभ में डुबकी लगाएंगी, जानिए कितनी है उनकी नेटवर्थ

प्रिवेंटिव डिटेंशन का इस्तेमाल जमानत रद्द करने के लिए नहीं किया जा सकता
हाईकोर्ट ने एक अन्य आदेश में कहा है कि जेल में बंद व्यक्ति के खिलाफ नजरबंदी आदेश तभी वैध माना जा सकता है, जब हिरासत लेने वाले अधिकारी के पास ठोस सामग्री हो कि रिहा होने पर व्यक्ति फिर वैसी ही गतिविधियों में लिप्त होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निवारक नजरबंदी को जमानत आदेशों को निष्प्रभावी करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने आगरा निवासी विजय गोयल की निवारक नजरबंदी को रद्द करते हुए दिया है।

ये भी पढ़ें :  गुजरात के बनासकांठा के डीसा में तनाव की स्थिति, गरबा खेल रही पत्नी को फुसला कर ले गया मुस्लिम लड़का

कोर्ट ने याची को तत्काल रिहा करने का आदेश देते हुए कहा कि याची के मामले में न तो डीएम, न केंद्र सरकार और न ही सलाहकार बोर्ड ने कोई तर्कसंगत आदेश किया। सभी आदेशों में न्यायिक विवेक के प्रयोग का अभाव पाया गया। विजय गोयल के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट से जुड़े चार मामलों के आधार पर प्रदेश सरकार के गृह सचिव ने निवारक नजरबंदी का आदेश जारी किया था जबकि चारों मामलों में विजय को हाईकोर्ट से पहले ही जमानत मिल चुकी थी।

Share

क्लिक करके इन्हें भी पढ़ें

Leave a Comment